2026 मानसून अलर्ट: औसत से 8% कम बारिश, उत्तर-मध्य भारत में सूखे का खतरा

2026 मानसून अलर्ट: औसत से 8% कम बारिश, उत्तर-मध्य भारत में सूखे का खतरा

भारत के लिए 2026 की मानसून रिपोर्ट चिंताजनक संकेत दे रही है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और निजी एजेंसी Skymet Weather दोनों ने चेतावनी दी है कि इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान बारिश सामान्य से 6% से 8% कम रह सकती है। 8 अप्रैल, 2026 को जारी इन अनुमानों का सीधा असर देश की खाद्य सुरक्षा और करोड़ों किसानों की जेब पर पड़ेगा, क्योंकि जून से सितंबर के बीच बारिश की कमी का मतलब है—खेतों में सूखती फसलें और घटता जलस्तर।

मामला सिर्फ कुछ बूंदों की कमी का नहीं है, बल्कि एक बड़े जलवायु बदलाव का है। दरअसल, प्रशांत महासागर में पानी के तापमान में हो रहे बदलावों ने भारत की बारिश की लय बिगाड़ दी है। पिछले साल (2025) जहां 'ला नीना' की वजह से अच्छी बारिश हुई थी, वहीं अब माहौल बदल रहा है। अब वहां 'एल नीनो' या न्यूट्रल स्थितियां बन रही हैं, जो आमतौर पर भारतीय मानसून की कमर तोड़ देती हैं।

बारिश के आंकड़ों का गणित: क्या कहता है अनुमान?

अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें, तो सामान्य तौर पर जून से सितंबर के बीच औसत बारिश 868.6 मिलीमीटर होती है। लेकिन इस बार यह आंकड़ा गिरकर काफी नीचे आने की उम्मीद है। Skymet Weather का मानना है कि बारिश लगभग 817 मिलीमीटर (औसत का 94%) तक सिमट जाएगी, जबकि IMD ने इसे और भी गंभीर बताते हुए औसत के 92% तक रहने का अनुमान लगाया है।

दिलचस्प बात यह है कि मानसून की शुरुआत तो ठीक होगी, लेकिन धीरे-धीरे यह दम तोड़ने लगेगा। जून में करीब 101% बारिश के साथ माहौल सामान्य रहेगा, लेकिन जुलाई आते-ही यह घटकर 95% रह जाएगा। असली संकट अगस्त और सितंबर में आएगा, जब बारिश क्रमशः 92% और 89% तक गिर सकती है। यानी जैसे-जैसे फसलें पकने की ओर बढ़ेंगी, आसमान से मिलने वाला साथ कम होता जाएगा।

मुख्य तथ्य एक नजर में:
  • कुल कमी: सामान्य से 6-8% कम बारिश का अनुमान।
  • सबसे खराब महीना: सितंबर (केवल 89% बारिश)।
  • मुख्य कारण: प्रशांत महासागर में एल नीनो का प्रभाव।
  • जोखिम वाले क्षेत्र: उत्तर, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत।

क्षेत्रीय प्रभाव: कहां सूखे की तलवार और कहां राहत?

पूरा भारत एक जैसा असर नहीं झेलेगा। सबसे ज्यादा मार मध्य भारत और पश्चिमी भारत के वर्षा-आधारित कृषि क्षेत्रों पर पड़ेगी। उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत, जिसमें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू और कश्मीर और उत्तर प्रदेश के हिस्से शामिल हैं, वहां अगस्त-सितंबर में गंभीर सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।

यही नहीं, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के विदर्भ जैसे इलाके भी इस सूखे की चपेट में आने वाले हैं। लेकिन राहत की बात यह है कि पूर्व और उत्तर-पूर्वी भारत, जैसे बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और मेघालय में बारिश सामान्य या उससे अधिक रहने की उम्मीद है। दक्षिण भारत में भी स्थिति संतुलित रहने का अनुमान है।

खेती और अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रहार

जब मानसून धोखा देता है, तो सबसे पहले रसोई का बजट बिगड़ता है। इस बार चावल, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। जुलाई और अगस्त वो महीने होते हैं जब इन फसलों को सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होती है, और ठीक इसी समय बारिश में गिरावट आने की संभावना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय पर बारिश नहीं हुई, तो पैदावार में भारी कमी आएगी। इसके अलावा, बांधों और जलाशयों में पानी का स्तर गिर जाएगा, जिससे न केवल सिंचाई बल्कि आने वाली गर्मियों में पीने के पानी का संकट भी गहरा सकता है। ऊपर से 'एल नीनो' की वजह से तापमान औसत से ज्यादा रहने की उम्मीद है, जो मिट्टी की नमी को और तेजी से सोखेगा (एक तरह का डबल अटैक)।

भविष्य की चुनौतियां और तैयारी

अब सवाल यह है कि आगे क्या? सरकार और किसानों को अब से ही 'वॉटर मैनेजमेंट' पर जोर देना होगा। ड्रिप सिंचाई और कम पानी वाली फसलों के विकल्प तलाशना अब जरूरत बन गया है। यदि सितंबर की बारिश उम्मीद से कम रही, तो रबी सीजन की तैयारी पर भी असर पड़ेगा।

इतिहास गवाह है कि जब भी एल नीनो का प्रभाव रहा है, भारत में कृषि उत्पादन घटा है। 2025 की अच्छी बारिश के बाद अब 2026 का यह अनुमान एक चेतावनी है कि प्रकृति का मिजाज कब बदल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। अब सबकी नजरें जून में मानसून के आगमन पर टिकी हैं कि क्या यह पूर्वानुमान गलत साबित होता है या हम एक कठिन साल की ओर बढ़ रहे हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

2026 में मानसून कम होने का मुख्य कारण क्या है?

इसका मुख्य कारण प्रशांत महासागर में 'ला नीना' की स्थिति का खत्म होना और 'एल नीनो' या न्यूट्रल स्थितियों का विकसित होना है। एल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर का पानी गर्म हो जाता है, जिससे मानसून की हवाएं कमजोर पड़ती हैं और भारत में बारिश कम होती है।

किन राज्यों में सूखे का सबसे अधिक खतरा है?

उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में खतरा सबसे ज्यादा है। विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बारिश की भारी कमी देखी जा सकती है। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में भी सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।

किन फसलों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ेगा?

मुख्य रूप से चावल, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलें प्रभावित होंगी। इन फसलों को जुलाई और अगस्त के महत्वपूर्ण विकास चरणों के दौरान प्रचुर पानी की आवश्यकता होती है, और इसी समय बारिश में गिरावट का अनुमान है।

क्या पूरे भारत में बारिश कम होगी?

नहीं, यह क्षेत्रीय वितरण पर निर्भर करता है। जहां उत्तर और पश्चिम भारत में कमी होगी, वहीं पूर्व और उत्तर-पूर्वी राज्य जैसे बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और मेघालय में बारिश सामान्य या उससे अधिक रहने की उम्मीद है। दक्षिण भारत में भी स्थिति सामान्य रहने का अनुमान है।

IMD और Skymet के अनुमानों में क्या अंतर है?

दोनों संस्थाएं बारिश में कमी का अनुमान लगा रही हैं, लेकिन उनके आंकड़ों में थोड़ा अंतर है। Skymet ने बारिश को औसत से 6% कम (लगभग 817 मिमी) बताया है, जबकि IMD ने इसे थोड़ा और गंभीर मानते हुए 8% कम रहने का अनुमान लगाया है।

अप्रैल 14, 2026 द्वारा Sudeep Soni

द्वारा लिखित Sudeep Soni

मैं एक वरिष्ठ पत्रकार हूं और मैंने अलग-अलग मीडिया संस्थानों में काम किया है। मैं मुख्य रूप से समाचार क्षेत्र में सक्रिय हूँ, जहाँ मैं दैनिक समाचारों पर लेख लिखने का काम करता हूं। मैं समाज के लिए महत्वपूर्ण घटनाओं की रिपोर्टिंग करता हूं और निष्पक्ष सूचना प्रदान करने में यकीन रखता हूं।